“मंजिलें भी उसकी थीं,
रास्ते भी उसके थे ,
मैं तनहा था ,
काफिले भी उसके थे ,
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी,
फिर रास्ते बदलने का फ़ैसला भी उसका था,
आज क्यूँ तनहा है ये दिल सवाल करता है ,
लोग तो उसके थे ही ,
क्या खुदा भी उसका था …..”
कुछ शब्द याद आए जो मशहूर व्यिक्तत्व कैफी आजमी साहब ने कहे हैं :
कोई ये कैसे बताये के वो तन्हा क्यों हैं
वो जो अपना था वो ही और किसी का क्यों हैं
यही दुनिया है तो फ़िर ऐसी ये दुनिया क्यों हैं
यही होता हैं, तो आखिर यही होता क्यों हैं
एक ज़रा हाथ बढ़ा, दे तो पकड़ लें दामन
उसके सीने में समा जाये हमारी धड़कन
इतनी क़ुर्बत* हैं तो फ़िर फ़ासला इतना क्यों हैं
दिल – ए – बरबाद से निकला नहीं अब तक कोई
एक लुटे घर पे दिया करता हैं दस्तक कोई
आस जो टूट गयी फ़िर से बंधाता क्यों हैं
तुम मसर्रत* का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
कहते हैं प्यार का रिश्ता हैं जनम का रिश्ता
हैं जनम का जो ये रिश्ता , तो बदलता क्यों है
कोई ये कैसे बताये के वो तन्हा क्यों हैं ??? :’(
** कुर्बत=समीपता ; मसर्रत=खुशी




lovely kumari said,
July 5, 2008 at 7:23 pm
aap hindi me kyon nahi likhte.google ki anuwad sewa ka upyog karen..asha hai aap anytha nahi lenge..kavita achchhi thi
URL yah hai
http://www.google.com/transliterate/indic/